प्रियंका चोपड़ा ने अमेरिका में ग्रेट स्पीच देकर भारत का मान बढ़ा दिया

By | जून 19, 2019
priyank chopra speech

2017 में प्रियंका चोपड़ा को अमेरिका की एक वैराइटी मैगज़ीन ने “पावर ऑफ़ वीमेन ” अवार्ड से सम्मानित किया इस मौके पर प्रियंका चोपड़ा ने जो स्पीच दी वो स्पीच किसी महिला द्वारा दी गयी अब तक की सबसे महान स्पीचों में से एक बन गयी | आइये जानते है उस स्पीच में प्रियंक चोपड़ा ने क्या कहा ? इस स्पीच को भास्कर न्यूज़ पेपर ने अपने एक प्रमुख पेज पर जगह दी है |

प्रियंका चोपड़ा स्पीच

” मैं उन असाधारण माता-पिता के बेटी हूँ जिन्होंने भारतीय सेना में डॉक्टर के रूप में अपनी सेवा दी है, मैं पहले पैदा हुयी थी और जहाँ तक मुझे याद है मैंने अपने माता-पिता को 99 प्रतिशत मौकों पर बहुत गर्व कराया और उन्हें खुश किया हैं, मेरा भाई कुछ साल बाद पैदा हुआ और तब भी मेरे लिए कुछ नहीं बदला था |

हम दोनों को समान अवसर दिए गए थे और मैं इसी बात पर ज़ोर देना चाहती हूँ, क्यूंकि मुझे नहीं लगता की बहुत से लोग ये समझ सकते है की समान होना बहुत सामान्य है, ये वास्तव में किसी सौभाग्य से कम नहीं है| लड़के और लड़की के बीच घोर असमानता का मेरा अनुभव बहुत कम उम्र में हो गया था |

प्रियंका चोपड़ा के माता पिता

मैं एक मध्यमवर्गीय परिवार में उदार और परोपकारी माता-पिता की छत्र छाया में पली-बढ़ी, जिन्होंने मुझे और मेरे भाई लगातार याद दिलाया की हम कितने भाग्यशाली थे, और जो काम भाग्यशाली थे , उनके लिए कुछ करना कोई विकल्प या पसंद की बात नहीं बल्कि ये जीवन जीने का एक तरीका था |

मैं सात या आठ साल की थी, जब मेरे माता-पिता मुझे उन यात्राओं पर ले जाते थे जहाँ वे शहर के आसपास के गावों और विकसित हो रहे समुदायों को स्वास्थ्य सुविधाएं देते थे | हम एम्बुलेंस में बैठकर जाते और मेरे माता-पिता ऐसे लोगों को मुफ्त इलाज़ करते जो वहन नहीं कर सकते थे | आठ साल की उम्र में मेरा काम एक असिस्टेंट फार्मासिस्ट का था | मैं सभी दवाइयों को एक लिफाफे में रखती और मरीजों को देती थी, मैंने अपने इस काम को बहुत गम्भीरता से किया |

लेकिन जितना अधिक मैं इन अभियानों गयी उतना ही मैंने उन सरलतम चीजों पर धयान देना शुरू कर दिया जो एक लड़की और लड़के या एक पुरुष को महिला से अलग करते है, जैसे लड़कियों को उस वक़्त स्कूल से हटा दिया जाता था जब वो युवावस्था में कदम रखती थी, क्यूंकि उन्हें शादी और बच्चों के लिए तैयार माना जाता है और ये 12 से 13 साल की उम्र है, लेकिन लड़के इस उम्र में अपने बचपन का आनंद लेते रहते हैं,

हेल्थ केयर जैसे बुनियादी मानव अधिकारों से उन्हें इसलिए वंचित किया जाता था क्यूंकि वो महिलाये थी,

लड़की और लड़के में भेदभाव ने मेरी पूरी सोच बदल दी

इस अनुभव ने मेरी सोच को को ही बदल कर रख दिया और समय गुजरा और ऐसे अनुभव और बढ़ते गए| उदाहरण के तौर पर अपने करियर की शरुआत में जब मैं लगभग 18 या 19 साल की थी तब मुझे निर्मात निर्देशक कहा करते थे की अगर मैं उनकी फिल्मो में बेतुकी शर्तों को मानने या कम सैलरी के लिए तैयार नहीं हुयी तो वो मुझे replace कर देंगे क्यूंकि लड़कियां मनोरजन के व्यवसाय में बदलती रहती हैं

इस अनुभव ने मुझे खुद को ऐसा बनने लिए प्रेरणा दी की मुझे replace ही न किया जा सके |

लेकिन मुझे लगता है की मेरी हाउस कीपर के बेटी से मिलने के बाद ही मेरे अंदर वास्तविक बदलाव आये | आखिरकार इसी स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए “प्रियंका चोपड़ा फाउंडेशन” की नीव बनाने और ‘यूनिसेफ’ के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित किया |

लगभग 12 साल पहले मैं दिन सेट से जल्दी घर चली गयी थी और लाइब्रेरी में बैठी किताब पढ़ रही थी, वो आठ या नौ साल की होगी और मुझे पता था की वो किताब पढ़ना पसंद करती है तो मैंने उससे पूछा , आज वीकेंड है… तो तुम स्कूल क्यूँ नहीं गयी ? तो उसने जवाब दिया मैं स्कूल नहीं नहीं जाती, मैंने जाकर उसकी माँ पुछा की वो स्कूल क्यूँ नहीं जाती और उसकी माँ ने बताया की उसकी माँ और उसका परिवार उसे स्कूल भेजने में सक्षम नहीं है, वो जल्दी ही उसकी शादी देंगे, इस बात ने मुझे अंदर तक झंकझोर दिया फिर मैंने उसकी पढाई का खर्चा उठाने का फैसला किया ताकि वो सीखना जारी रख सके, क्यूंकि शिक्षा एक बुनियादी मानव अधिकार है और आजकी एक बड़ी आवश्यकता है उस समय से में एक अंतर पैदा करने के लिए दृढ थी,

लड़कियों में दुनिया को बदलने के ताकत है | पिछले दो दशकों से सभी प्रयासों और प्रगति के बावजूद प्राथमिक स्कूल के 10 मिलियन लड़को की तुलना में 15 मिलियन लड़कियों ने कभी नहीं सीखा की कैसे पढ़ना और सीखना है, प्राथमिक स्कूल ही हमारे भविष्य की शुरुआत है, पिछले 11 सालों में मैंने पहली बार अविश्वसनीय काम देखा जो यूनिसेफ दुनिया भर के बच्चों के लिए करता है, लेकिन अभी बहुत काम बाकी है, जिस कारण से मैं इस अभियान को लेकर प्रतिबद्ध हूँ, ये मेरा जुनून ही है की मुझे पता है एक लड़की की शिक्षा न केवल परिवार बल्कि समुदाय और देश की अथ्वयवस्था को सशक्त बनाती है, लड़की की बेहतर शिक्षा से ही हम बेहतर करते हैं |

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